शेर
तेरे प्यार
के इकरारनामे पर
,
अपने दिल
के लहू से,
किये हैं
दस्तखत मैंने.
शुक्र है
की मौत की
आगोश में हूँ,
वरना तुम्हें इतना प्यारा न होता.
इससे पहले
की ग़म के
बदल,
रौशन घर
में अँधेरा करते,
आहट ने तेरी-
आहट ने तेरी-
चिराग-ए-मुहब्बत जला दिया.
हुआ नहीं दीदार-ए-यार फिर भी,
पथराई नहीं हैं आँखें,
उनकी राह तकते-तकते.
उनके आने से सितम, बढ़ जाते हैं इस कदर-
की वो देखते तो हैं मगर बात नहीं करते.
हुआ नहीं दीदार-ए-यार फिर भी,
पथराई नहीं हैं आँखें,
उनकी राह तकते-तकते.
उनके आने से सितम, बढ़ जाते हैं इस कदर-
की वो देखते तो हैं मगर बात नहीं करते.
स्याह रातों में अपने ही बदन को छूकर-
मैं समझ लेता हूँ कि उनसे मुलाकात हो गयी.
तेरे जलवे ही हैं साकी जो रोक लेते हैं मुझको-
वरना तेरे मैखाने से-
जाना चाहता है जिंदा कौन?
ये गुलों की खुशबू
लग रही बड़ी भली है।
सांसों में बस जाने दो इसको
शाम अभी तो ढली है
ठहरो सारी रात है बाकी
बात अभी तो चली है।
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