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Showing posts from November, 2007

लावारीस वस्तुओं को न छुएं।

सड़क पर पड़ा बटुआ मिलने पर उसे लौटने के सवाल पर पत्नी का जवाब था,''अगर उसमे नाम-पता होगा तो जरूर लौटा दूंगी।'' यह तो अपने-अपने मन की बात है, किसी को हत्या करके भी नींद आ सकती है तो कोई दूसरे पर अन्याय होते देखकर भी चुप नहीं रह सकता।'' सचमुच इमानदारी को किसी भौतिक लाभ से नहीं तौला जा सकता। यह उससे कहीं ऊपर है। लेकीन क्यों मेट्रो स्टेशन पर धक्का मुक्की करने वाले लोग सीट पा जाते हैं? जबकि ईमानदारी से पंक्तिबद्ध चलने वालों को खडे होकर यात्रा करनी पड़ती है। क्यों चौराहे पर बत्ती खराब होने पर गलत तरीके से घुसपैठ करने वालों को रास्ता मिल जाता है और इमानदारों को इंतजार करना पड़ता है? क्यों नक़ल द्वारा छात्रों को पास करवा देने वाले अध्यापकों का परीक्षा परिणाम इमानदार अध्यापकों कि तुलना में कम आता है? क्यों ईमानदारी के लिए पारितोषिक मिलाने के स्थान पर दंड जैसी स्थिती का सामना करना पड़ता है? आख़िर क्यों? आजकल के परिवेश में ईमानदारी का अर्थ भोलापन या बुद्धुपन भी लगाया जाता है। वहीं बेईमानी चालाकी का नाम लेकर फल-फूल रही है। ऊपर दोहराई गई बातें अब इमानदारी की श्रेणी से बाहर ह...

यह आम रास्ता नहीं है।

पत्नी ने कहा,''खाली बैठे हो , जाकर बाज़ार से सब्जी ही ला दो। '' हाथ में थैला थमा दिया और अदरक ज़रूर लाने की हिदायत भी दे डाली । हमने भी सोचा कि सुबह से पढे पढाये अखबार में अब क्या झख मारें, सो चल दिए थैला उठा कर सब्जी मंडी। पैदल चलते- चलते रास्ते में ही हमने तय कर लिया था कि सौ रुपये की सब्जी लेंगे। इससे ज्यादा एक पैसा खर्च न करेंगे। सब्जी मंडी में सब्जीवाले सब्जियों को सजा-सजा कर रख रहे थे। इक्के-दुक्के ग्राहक भी नज़र आ रहे थे। यूं कहिये की सब्जी मंडी की अभी शुरुआत ही हुयी थी। हमने सब्जी को सूंघकर, दबाकर, नाखून मारकर, यानी हर तरह से ठोक-बजाकर , सारी सब्जियों का मोलभाव करके , तराजू के बाटों को जांच परख कर अंततः सब्जी खरीदने का दुष्कर कार्य एक घंटे में समाप्त किया । अचानक याद आया क अदरक लेना तो भूल ही गए। पत्नी के आकाशवाणी समान वाक्य को सम्मान देना परमावश्यक था। हमने सब्जी वाले को थोडा अदरक मुफ्त में देने को कहा। केन्तु वह 'न जाने क्यों ' अदरक न देने के जिद पर अड़ गया । हमने भी उसकी सारी सब्जी यह कहकर लौटा दी,''भैया, अदरक नहीं देते तो यह लो तुम्हारी सब्ज...