लावारीस वस्तुओं को न छुएं।
सड़क पर पड़ा बटुआ मिलने पर उसे लौटने के सवाल पर पत्नी का जवाब था,''अगर उसमे नाम-पता होगा तो जरूर लौटा दूंगी।'' यह तो अपने-अपने मन की बात है, किसी को हत्या करके भी नींद आ सकती है तो कोई दूसरे पर अन्याय होते देखकर भी चुप नहीं रह सकता।'' सचमुच इमानदारी को किसी भौतिक लाभ से नहीं तौला जा सकता। यह उससे कहीं ऊपर है। लेकीन क्यों मेट्रो स्टेशन पर धक्का मुक्की करने वाले लोग सीट पा जाते हैं? जबकि ईमानदारी से पंक्तिबद्ध चलने वालों को खडे होकर यात्रा करनी पड़ती है। क्यों चौराहे पर बत्ती खराब होने पर गलत तरीके से घुसपैठ करने वालों को रास्ता मिल जाता है और इमानदारों को इंतजार करना पड़ता है? क्यों नक़ल द्वारा छात्रों को पास करवा देने वाले अध्यापकों का परीक्षा परिणाम इमानदार अध्यापकों कि तुलना में कम आता है? क्यों ईमानदारी के लिए पारितोषिक मिलाने के स्थान पर दंड जैसी स्थिती का सामना करना पड़ता है? आख़िर क्यों? आजकल के परिवेश में ईमानदारी का अर्थ भोलापन या बुद्धुपन भी लगाया जाता है। वहीं बेईमानी चालाकी का नाम लेकर फल-फूल रही है। ऊपर दोहराई गई बातें अब इमानदारी की श्रेणी से बाहर ह...