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Showing posts from July, 2014

BAA-RISH

मन खिन्न है, पिन्न है, भिनभिना रहा- पसीना बह-बह कर कमर से नीचे आ रहा,   खुदा सूरज ऑन करके जाने कहाँ सो गया।   एक बारिश से सब बदल गया- कीट जो पतिंगा बना, काम से गया।  गर्मी से प्यास से पसीने की बास से, सिकुड़ा पड़ा ये दिल संभल गया।  चींटा जिसके कल पर निकल आये थे, अपने ही साथियों का, निवाला बन गया।  खिल रही हैं कलियाँ, निकल रही छिपकलियाँ, रस पीती कोई मक्खी, कोई कीट पेट में गया।  नन्हा-सा वह तिनका, जो अपनी जड़ को छू रहा- गीलेपन से तनकर, अब घास बन गया।  बस्ती के सभी बच्चों में, मस्ती है-जोश है-नाच है, क्या हुआ गर उनके घरों में, पानी भर गया।  घोंसले के भीतर नादान परिंदे चहकते हैं, अब तो खाना है, पानी है, अहा ! जश्न हो गया।  खोल पंखों को  मोर नाचा इस कदर, देखकर मोरनी को भी जैसे जोश आ गया।  ( देखकर मोरनी का  भी जैसे होश खो गया। ) बारिश के रुकते ही टपकती छत पे लगाऊंगा कोलतार, इसी सोच में वह तीखी मिर्च का, पकोड़ा निगल गया।  इस गीलेपन से मगर परेशान है 'घर' वाली, धुले म...