कविता की कविता
अधिक खा लेने से- पेट में कुछ भारीपन सा आ गया था। मज़बूरी में टहलते हुए शायद- भिखमंगे के सूखे शरीर को देख लिया था। तब ही से कविता बनाने की उधेड़बुन में, कुछ पेट और कुछ भेजा ऐंठ रहा था। शाम होते-होते- मालूम नहीं अपच से, या शब्दों की खींचतान से, सिर में हल्का दर्द सा हो रहा था। पत्नी ने चाय के साथ पर्ची थमाई, ''यह सामान कल ही लाना था।'' मूंग,चना, उड़द की दाल, भूख, भीख... क्या उसे आज खाना मिल पाया था ? एक किलो नमक, काबुली चने मोटे वाले.... कविता का क्या शीर्षक हो सकता था ? ''ठहरो ! मत जाओ, अभी बच्चे को संभालो। आज यह बेड से गिर गया था। देखो माथे पर लाल चोट...'' सही शब्द नही मिल रहा था। दिमाग में शब्दों के बुलबुले बनते-फूटते हैं। बच्चा रोये चला जा रहा था। '' बच्चे को ठीक से संभाल भी नहीं सकते। '' एक कविता की शुरुआत का अंत हो रहा था। ''बच्चा मुझे दो, बाज़ार से सामान ही ला दो। '' मैं थैला लेकर भारी कदमो से चल दिया था।