पत्नी ने कहा,''खाली बैठे हो , जाकर बाज़ार से सब्जी ही ला दो। '' हाथ में थैला थमा दिया और अदरक ज़रूर लाने की हिदायत भी दे डाली । हमने भी सोचा कि सुबह से पढे पढाये अखबार में अब क्या झख मारें, सो चल दिए थैला उठा कर सब्जी मंडी। पैदल चलते- चलते रास्ते में ही हमने तय कर लिया था कि सौ रुपये की सब्जी लेंगे। इससे ज्यादा एक पैसा खर्च न करेंगे। सब्जी मंडी में सब्जीवाले सब्जियों को सजा-सजा कर रख रहे थे। इक्के-दुक्के ग्राहक भी नज़र आ रहे थे। यूं कहिये की सब्जी मंडी की अभी शुरुआत ही हुयी थी। हमने सब्जी को सूंघकर, दबाकर, नाखून मारकर, यानी हर तरह से ठोक-बजाकर , सारी सब्जियों का मोलभाव करके , तराजू के बाटों को जांच परख कर अंततः सब्जी खरीदने का दुष्कर कार्य एक घंटे में समाप्त किया । अचानक याद आया क अदरक लेना तो भूल ही गए। पत्नी के आकाशवाणी समान वाक्य को सम्मान देना परमावश्यक था। हमने सब्जी वाले को थोडा अदरक मुफ्त में देने को कहा। केन्तु वह 'न जाने क्यों ' अदरक न देने के जिद पर अड़ गया । हमने भी उसकी सारी सब्जी यह कहकर लौटा दी,''भैया, अदरक नहीं देते तो यह लो तुम्हारी सब्ज...