बुलबुले
कोमल, गीले और चुलबुले, साबुन पानी के ओये बुलबुले ऊपर उठते और फूटते, केवल पल भर को ही जीते, हलके-हलके और चमकीले, साबुन पानी के आहा बुलबुले। फूंक मारकर नए बनाए, उन्हें पकड़ने बच्चे आये, पकड़ न पाए बडे पिलपिले। बन पत्थर क्या इतना जीना, इक क्षण को ही हंसकर पीना, छू मंतर झट हवा में घुले। साबुन पानी के आहा बुलबुले कोमल गीले और चुलबुले। साबुन पानी के ओये बुलबुले