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Showing posts from December, 2007

बुलबुले

कोमल, गीले और चुलबुले, साबुन पानी के ओये बुलबुले ऊपर उठते और फूटते, केवल पल भर को ही जीते, हलके-हलके और चमकीले, साबुन पानी के आहा बुलबुले। फूंक मारकर नए बनाए, उन्हें पकड़ने बच्चे आये, पकड़ न पाए बडे पिलपिले। बन पत्थर क्या इतना जीना, इक क्षण को ही हंसकर पीना, छू मंतर झट हवा में घुले। साबुन पानी के आहा बुलबुले कोमल गीले और चुलबुले। साबुन पानी के ओये बुलबुले

दीवाली

किस्म - किस्म के सब सामान , सजी - धजी हर एक दुकान, ज्यादा खर्चो अधिक बचाओ, इनामों के अवसर पाओ, लुभाता है हर विज्ञापन । लालायित हो जाता मन, इस दीवाली तुझको क्या दूँ? इतना छोटा सा वेतन? चीजों से भी बड़े बड़े उन पर बंधे हुए - कागज़ के टुकड़े। काश तुम्हें मैं दे सकता- सुगंध भरा एक चंदन वन। इस दीवाली तुझको क्या दूँ? इतना छोटा सा वेतन ? काश कि होती पास मेरे- हरियाले नोटों की क्यारी, सौ कमरों का महल बनता, गहने कपड़ों से भर देता- हर कमरे की हर अलमारी। मध्य में आ जाता है लेकिन , इस दीवाली तुझको क्या दूँ? इतना छोटा सा वेतन?