लहू जम गया
प्लास्टिक की पन्नी में से गर्मागर्म चाय-
ध्यान से उड़ेलना,
कहीं फटी हुई न हो-
प्लास्टिक की छोटी-छोटी-
प्यालियों में से कोई एक।
और बह निकले मेरी नकसीर की तरह।
गर्मी ने अख़बार की सुर्ख़ियों को,
पिघलाकर और बड़ा कर दिया है।
धूप भले ही गरम है, लेकिन गर्मी-
गर्मी को मार डालती है।
वैसे ही जैसे-
काँटे से ही काँटा निकलता है।
बैठ कर छितराई सी छाँव में-
हौले-हौले वो, चाय सुड़कता है।
आज तड़के घरवाली के हाथों बनी-
रोटी जो पुराने रददी अख़बार में-
मुचड़ी, सिकुड़ी, लिपटी-
जिससे कुछ ख़बरें इस पर उतरीं,
पर इससे अनजान-
कौर-कौर खाता।
प्यासे, सूखे कण्ठ से नीचे-
घूँट-घूँट सरकाता है।
क्या पसीना ?
अब ना होगा, तो कब होगा ?
यह लो अंगोछा, और मुँह पोंछा।
बेफिक्री से हाथ हिलाते, करता है बातें।
लेकिन धूप ने उसे-
नोचा, निचोड़ा,झिंझोड़ा।
बून्द-बून्द पसीना टपककर,
कपड़े बदन पर चिपककर,
टूटा कुछ उसके भीतर।
थोड़ी देर के बाद-
मोटे लट्ठ से बंधी आदमकद झाड़ू-
चलने लगी फिर से।
लेकिन ज़रा धीमे होने लगे थे हाथ-
उखड़ने लगी साँस,मिचलाने लगा जी,
उलट सब उदर गया, निकलने लगा जी।
बदन ऐंठकर पटका, लगा जैसे बिजली का झटका।
पड़ा तड़पता, सड़क वाली कोलतार पर-
दौड़ आए सुनकर चीख,
ले चले ठण्डी छाँव,
मैं भी जाता-
लेकिन सूखी नहीं है अभी-
मेरी नाक से टपकी-
लहू की एक बून्द।
ध्यान से उड़ेलना,
कहीं फटी हुई न हो-
प्लास्टिक की छोटी-छोटी-
प्यालियों में से कोई एक।
और बह निकले मेरी नकसीर की तरह।
गर्मी ने अख़बार की सुर्ख़ियों को,
पिघलाकर और बड़ा कर दिया है।
धूप भले ही गरम है, लेकिन गर्मी-
गर्मी को मार डालती है।
वैसे ही जैसे-
काँटे से ही काँटा निकलता है।
बैठ कर छितराई सी छाँव में-
हौले-हौले वो, चाय सुड़कता है।
आज तड़के घरवाली के हाथों बनी-
रोटी जो पुराने रददी अख़बार में-
मुचड़ी, सिकुड़ी, लिपटी-
जिससे कुछ ख़बरें इस पर उतरीं,
पर इससे अनजान-
कौर-कौर खाता।
प्यासे, सूखे कण्ठ से नीचे-
घूँट-घूँट सरकाता है।
क्या पसीना ?
अब ना होगा, तो कब होगा ?
यह लो अंगोछा, और मुँह पोंछा।
बेफिक्री से हाथ हिलाते, करता है बातें।
लेकिन धूप ने उसे-
नोचा, निचोड़ा,झिंझोड़ा।
बून्द-बून्द पसीना टपककर,
कपड़े बदन पर चिपककर,
टूटा कुछ उसके भीतर।
थोड़ी देर के बाद-
मोटे लट्ठ से बंधी आदमकद झाड़ू-
चलने लगी फिर से।
लेकिन ज़रा धीमे होने लगे थे हाथ-
उखड़ने लगी साँस,मिचलाने लगा जी,
उलट सब उदर गया, निकलने लगा जी।
बदन ऐंठकर पटका, लगा जैसे बिजली का झटका।
पड़ा तड़पता, सड़क वाली कोलतार पर-
दौड़ आए सुनकर चीख,
ले चले ठण्डी छाँव,
मैं भी जाता-
लेकिन सूखी नहीं है अभी-
मेरी नाक से टपकी-
लहू की एक बून्द।
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