मजदूरिन के बच्चे

मजदूरिन के बच्चे-
'साईट' पर पड़े हैं,
नंगे, धूप में, भूखे बिलख रहे हैं। 

ऐसा नहीं है कि माँ का ध्यान नहीं है,
पर काम छोड़ कर आना ही आसान नहीं है।  

मजदूरिन-
बोझा ढो-ढोकर थक जाती है,
रो-रोकर थक जाते हैं-
मजदूरिन के बच्चे। 

लो, लंच का टैम हो गया-
माँ बच्चों का मेल हो गया। 
माँ चटनी-रोटी खाती है-
बच्चे को सूखी रोटी मिल पाती है।
छोटा बच्चा, माँ के स्तन से चिपक-
कुछ दूध, और कुछ रक्त पीता है। 
भूखे ही रह जाते हैं-
मजदूरिन के बच्चे। 

जानती है माँ-
इसीलिए लाती है- 
रात को पके चावल का पानी।
बच्चे को निर्बल स्तन से हटा-
पिलाती है वह पानी। 
फिर थपकी दे-देकर- 
बच्चों को सुलाती है। 
कुछ देर के लिए सो जाते हैं-
मजदूरिन के बच्चे। 

आज रात रोटी की चिंता- 
और बच्चों को थपकी के बीच-
झपकी सी आ जाती है,
लेकिन ठेकेदार की डांट-
झकझोर कर उसे जगाती है। 
फिर ईंटें, गीली ईंटें, रक्तिम ईंटें-
रक्त की गति बढ़ाती हैं। 
जागकर माँ-माँ चिल्लाते हैं-
मजदूरिन के बच्चे। 

मजदूरिन की आज तबीयत ठीक नहीं है,
फिर भी वह काम पर लगी हुई है। 
' ठेकेदार जी आज पइसा दे दोगे,
हमरे पास एक पइसा भी बचा नहीं है। '
' हाँ देखेंगे।' डेली का  जवाब यही है। 
नीचे आकर, बच्चे को पानी पिला-
वह सुलाती है-
नींद में भी रोते हैं-
मजदूरिन के बच्चे। 

अब, लगता है मजदूरिन को-
तेज हो गया ज्वर है,
ईंटें भी लगती अब भारी-
और काँपता स्वर है,
काम मगर नहीं रुक सकता-
भूखे पेट पर नज़र है।

चढ़ी सीढियाँ, ईंटें भारी-
आया चक्कर, गिरी लुढ़ककर-
धरती पर लाश पड़ी है।
शोर को सुनकर जाग उठे जो-
माँ-माँ चिल्ला रहे हैं-
मजदूरिन के बच्चे। 

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