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कविता की कविता

अधिक खा लेने से- पेट में कुछ भारीपन सा आ गया था। मज़बूरी में टहलते हुए शायद- भिखमंगे के सूखे शरीर को देख लिया था। तब ही से कविता बनाने की उधेड़बुन में, कुछ पेट और कुछ भेजा ऐंठ रहा था। शाम होते-होते- मालूम नहीं अपच से, या शब्दों की खींचतान से, सिर में हल्का दर्द सा हो रहा था। पत्नी ने चाय के साथ पर्ची थमाई, ''यह सामान कल ही लाना था।'' मूंग,चना, उड़द की दाल, भूख, भीख... क्या उसे आज खाना मिल पाया था ? एक किलो नमक, काबुली चने मोटे वाले.... कविता का क्या शीर्षक हो सकता था ? ''ठहरो ! मत जाओ, अभी बच्चे को संभालो। आज यह बेड से गिर गया था। देखो माथे पर लाल चोट...'' सही शब्द नही मिल रहा था। दिमाग में शब्दों के बुलबुले बनते-फूटते हैं। बच्चा रोये चला जा रहा था। '' बच्चे को ठीक से संभाल भी नहीं सकते। '' एक कविता की शुरुआत का अंत हो रहा था। ''बच्चा मुझे दो, बाज़ार से सामान ही ला दो। '' मैं थैला लेकर भारी कदमो से चल दिया था।

क्या लिखूं ?

किस विषय पर लिखूं ? किन शब्दों को चुनूं ? पानी की किल्लत, बिजली की दिक्कत, बम की अफवाह, एम् पी की तनख्वाह, आखिर किस विषय पर लिखूं ? सिनेमा में बढ़ने वाली हिंसा, टी वी में सास बहू का kissa , शहर में उत्सव मनाते लोग, लाल बत्ती पर भीख मांगते लोग, कौन सा पात्र चुनूं ? किस विषय पर लिखूं ? कर्फ्यू की घबराहट, मंहगाई की आहट, शहर में बढ़ते बलात्कार, वेश्याओं के अधिकार, किसका पक्ष लूँ ? किस विषय पर लिखूं ? बेराजगारों का शोषण, दिनोदिन बढ़ता प्रदूषण, राजनेतिक घोटाले, दुकानों पर ताले, कहाँ से शुरू करूँ ? आखिर किस विषय पर लिखूं ? मौसम का हाल, बेंकों की हड़ताल, चित्रों की प्रदर्शनी, समाचारों में सनसनी, किसको छोड़ दूँ ? किस विषय पर लिखूं ? विवाहेतर प्रेम सम्बन्ध, मुनिश्री का प्रवचन, उठता गिरता सेंसेक्स, या फ़िर कोरा सेक्स, किस पर रचना गढ़ूं ? किस विषय पर लिखूं ? स्त्रियों पर होते अत्याचार, क्रिकेट में जीत या हार, जबरन बाल मजदूरी, किसानों की मज़बूरी, दुविधा से कैसे बचूं ? किस विषय पर लिखूं ?

उडी पतंग

ठुमक-ठुमक कर चली पतंग, आसमान पर चढ़ी पतंग, झूम-झूम कर इतराती- नभ में मोती सी जड़ी पतंग। चरखी मंझा डोर के संग, है जमीं में गाड़ी पतंग। सर-सर, फार-फार, सबसे टक्कर, इधर लपक कर, उधार झपट कर, किस-किस से है लड़ी पतंग। ठुमक-ठुमक कर चली पतंग, आसमान पर चढ़ी पतंग।

गर्मी

चढ़ गया पारा-चढ़ गया पारा। न बचा धरा का,कोई किनारा। अब करे क्या आदमी बेचारा, पड़ा धूप का वार करारा। चढ़ गया पारा-चढ़ गया पारा। इस गर्मी ने कितनों को मारा, दुबक गए जो फिरे आवारा। इसमे भी है दोष हमारा। चढ़ गया पारा-चढ़ गया पारा। अत्याचार किए हैं जमीं पर, सहना है परिणाम यहीं पर, कुछ नहीं होता जीवन में दोबारा। चढ़ गया पारा-चढ़ गया पारा।

ममता

माँ के मुख पर तैर रही है, शिशु के चेहरे की मुस्कान। रोता शिशु तो माँ की - निकल रही हो जैसे जान। माँ का स्नेह शीतल जलधारा - प्रवाह सतत, अकारण अविराम। रहा ढूंढता आजीवन- माँ की गोदी सा आराम।

गधे के पूत यहाँ मत मूत

दिल्ली सरकार और उसके मातहद विभाग आये दिन ऐसी बेसिर पैर की घोषणाएं करते रहते हैं। कुछ दिन पहले उपराज्यपाल ने सभी दिल्लीवासियों को अपना पहचान-पत्र साथ लेकर चलने की घोषणा की। उन्हें इस जमीनी हकीकत का ग्यान नहीं हे कि दिल्ली में लाखों लोगों के पास कोइ पहचान पत्र नहीं हे। जिनके पास पहचान पत्र हे भी, वह विभागीय भ्रष्टाचार के चलते कोइ भी प्राप्त कर सकता हे। ऐसे मी पहचान पत्र किसी व्यक्ती के आतंकवादी गतिविधिओं मी शामिल होने या न होने का प्रमाण नहीं बन सकता। नयी घोषणा हे की कूडा फेंकने वालों पर जुर्माना होगा। सरकार को चाहिऐ था की वे नागरिकों से पूछें की किन-किन स्थानों पर कूडेदान उपलब्ध कराये जाएँ ताकी वे उसका इस्तेमाल कर सकें। अनधिकृत कोलोनीयों की तो बात ही छोड़ दें, डी डी ए द्वारा बनाए व बसाए गए इलाक़ों में क्या ब्लॉक स्तर पर कूडेदान की व्यवस्था हे? ज़ाहिर हे ऐसा नहीं हे। सुविधाओं के अभाव में नागरिक कूड़ा इधर-उधर फेंकने को मजबूर हैं। वैसे इस चीख-पुकार से भी कोई अंतर पड़ने वाला नहीं है। सीग्रेट पीने वालों, पैदल चलने वालों, कूडा फेंकने वालों के ऊपर जुर्माने के बाद खुले मी पेशाब करने वालों व गुटक...

बुलबुले

कोमल, गीले और चुलबुले, साबुन पानी के ओये बुलबुले ऊपर उठते और फूटते, केवल पल भर को ही जीते, हलके-हलके और चमकीले, साबुन पानी के आहा बुलबुले। फूंक मारकर नए बनाए, उन्हें पकड़ने बच्चे आये, पकड़ न पाए बडे पिलपिले। बन पत्थर क्या इतना जीना, इक क्षण को ही हंसकर पीना, छू मंतर झट हवा में घुले। साबुन पानी के आहा बुलबुले कोमल गीले और चुलबुले। साबुन पानी के ओये बुलबुले