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उडी पतंग

ठुमक-ठुमक कर चली पतंग, आसमान पर चढ़ी पतंग, झूम-झूम कर इतराती- नभ में मोती सी जड़ी पतंग। चरखी मंझा डोर के संग, है जमीं में गाड़ी पतंग। सर-सर, फार-फार, सबसे टक्कर, इधर लपक कर, उधार झपट कर, किस-किस से है लड़ी पतंग। ठुमक-ठुमक कर चली पतंग, आसमान पर चढ़ी पतंग।

गर्मी

चढ़ गया पारा-चढ़ गया पारा। न बचा धरा का,कोई किनारा। अब करे क्या आदमी बेचारा, पड़ा धूप का वार करारा। चढ़ गया पारा-चढ़ गया पारा। इस गर्मी ने कितनों को मारा, दुबक गए जो फिरे आवारा। इसमे भी है दोष हमारा। चढ़ गया पारा-चढ़ गया पारा। अत्याचार किए हैं जमीं पर, सहना है परिणाम यहीं पर, कुछ नहीं होता जीवन में दोबारा। चढ़ गया पारा-चढ़ गया पारा।

ममता

माँ के मुख पर तैर रही है, शिशु के चेहरे की मुस्कान। रोता शिशु तो माँ की - निकल रही हो जैसे जान। माँ का स्नेह शीतल जलधारा - प्रवाह सतत, अकारण अविराम। रहा ढूंढता आजीवन- माँ की गोदी सा आराम।

गधे के पूत यहाँ मत मूत

दिल्ली सरकार और उसके मातहद विभाग आये दिन ऐसी बेसिर पैर की घोषणाएं करते रहते हैं। कुछ दिन पहले उपराज्यपाल ने सभी दिल्लीवासियों को अपना पहचान-पत्र साथ लेकर चलने की घोषणा की। उन्हें इस जमीनी हकीकत का ग्यान नहीं हे कि दिल्ली में लाखों लोगों के पास कोइ पहचान पत्र नहीं हे। जिनके पास पहचान पत्र हे भी, वह विभागीय भ्रष्टाचार के चलते कोइ भी प्राप्त कर सकता हे। ऐसे मी पहचान पत्र किसी व्यक्ती के आतंकवादी गतिविधिओं मी शामिल होने या न होने का प्रमाण नहीं बन सकता। नयी घोषणा हे की कूडा फेंकने वालों पर जुर्माना होगा। सरकार को चाहिऐ था की वे नागरिकों से पूछें की किन-किन स्थानों पर कूडेदान उपलब्ध कराये जाएँ ताकी वे उसका इस्तेमाल कर सकें। अनधिकृत कोलोनीयों की तो बात ही छोड़ दें, डी डी ए द्वारा बनाए व बसाए गए इलाक़ों में क्या ब्लॉक स्तर पर कूडेदान की व्यवस्था हे? ज़ाहिर हे ऐसा नहीं हे। सुविधाओं के अभाव में नागरिक कूड़ा इधर-उधर फेंकने को मजबूर हैं। वैसे इस चीख-पुकार से भी कोई अंतर पड़ने वाला नहीं है। सीग्रेट पीने वालों, पैदल चलने वालों, कूडा फेंकने वालों के ऊपर जुर्माने के बाद खुले मी पेशाब करने वालों व गुटक...

बुलबुले

कोमल, गीले और चुलबुले, साबुन पानी के ओये बुलबुले ऊपर उठते और फूटते, केवल पल भर को ही जीते, हलके-हलके और चमकीले, साबुन पानी के आहा बुलबुले। फूंक मारकर नए बनाए, उन्हें पकड़ने बच्चे आये, पकड़ न पाए बडे पिलपिले। बन पत्थर क्या इतना जीना, इक क्षण को ही हंसकर पीना, छू मंतर झट हवा में घुले। साबुन पानी के आहा बुलबुले कोमल गीले और चुलबुले। साबुन पानी के ओये बुलबुले

दीवाली

किस्म - किस्म के सब सामान , सजी - धजी हर एक दुकान, ज्यादा खर्चो अधिक बचाओ, इनामों के अवसर पाओ, लुभाता है हर विज्ञापन । लालायित हो जाता मन, इस दीवाली तुझको क्या दूँ? इतना छोटा सा वेतन? चीजों से भी बड़े बड़े उन पर बंधे हुए - कागज़ के टुकड़े। काश तुम्हें मैं दे सकता- सुगंध भरा एक चंदन वन। इस दीवाली तुझको क्या दूँ? इतना छोटा सा वेतन ? काश कि होती पास मेरे- हरियाले नोटों की क्यारी, सौ कमरों का महल बनता, गहने कपड़ों से भर देता- हर कमरे की हर अलमारी। मध्य में आ जाता है लेकिन , इस दीवाली तुझको क्या दूँ? इतना छोटा सा वेतन?

लावारीस वस्तुओं को न छुएं।

सड़क पर पड़ा बटुआ मिलने पर उसे लौटने के सवाल पर पत्नी का जवाब था,''अगर उसमे नाम-पता होगा तो जरूर लौटा दूंगी।'' यह तो अपने-अपने मन की बात है, किसी को हत्या करके भी नींद आ सकती है तो कोई दूसरे पर अन्याय होते देखकर भी चुप नहीं रह सकता।'' सचमुच इमानदारी को किसी भौतिक लाभ से नहीं तौला जा सकता। यह उससे कहीं ऊपर है। लेकीन क्यों मेट्रो स्टेशन पर धक्का मुक्की करने वाले लोग सीट पा जाते हैं? जबकि ईमानदारी से पंक्तिबद्ध चलने वालों को खडे होकर यात्रा करनी पड़ती है। क्यों चौराहे पर बत्ती खराब होने पर गलत तरीके से घुसपैठ करने वालों को रास्ता मिल जाता है और इमानदारों को इंतजार करना पड़ता है? क्यों नक़ल द्वारा छात्रों को पास करवा देने वाले अध्यापकों का परीक्षा परिणाम इमानदार अध्यापकों कि तुलना में कम आता है? क्यों ईमानदारी के लिए पारितोषिक मिलाने के स्थान पर दंड जैसी स्थिती का सामना करना पड़ता है? आख़िर क्यों? आजकल के परिवेश में ईमानदारी का अर्थ भोलापन या बुद्धुपन भी लगाया जाता है। वहीं बेईमानी चालाकी का नाम लेकर फल-फूल रही है। ऊपर दोहराई गई बातें अब इमानदारी की श्रेणी से बाहर ह...