एक और तो तुम बराबरी की बात करते हो और दूसरी ओर कहते हो कि गर्व से कहो, 'मैं चमार हूँ।' या 'मैं ठाकुर हूँ।' या 'मैं ब्राह्मण हूँ। ' या 'अग्रवाल समाज की जय।' जब तक समाज में एक वर्ण रहेगा तब तक अन्य तीन भी रहेंगे। यदि समाज में समानता लाने का लक्ष्य है तो जाति-व्यवस्था को समाप्त करना आवश्यक है। जाति-व्यवस्था नष्ट की जा सकती है। तुम पढ़ते आए हो-वर्ण चार होते हैं। यह विचार ही वर्ण व्यवस्था का मूल है। इससे ही इंकार करना है। आज के समाज में वर्ण व्यवस्था की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। इसने इतिहास में सदा हमारा अहित किया है और यह आज भी जारी है। जब विदेशी आक्रमणकारी आए तो उनसे मुकाबला करने के लिए पूरा समाज एकजुट होकर नहीं आया। क्योंकि शस्त्र चलाने का कार्य केवल एक ही वर्ण कर सकता था। इंसान एक है तथा सभी प्राणियों में वही है जो अपने मस्तिष्क को सबसे अधिक विकसित कर पाया है। लेकिन जैसे सभी सिंह एक समान हैं उसी प्रकार सभी मनुष्य एक समान हैं। उनमें कोई श्रेष्ठ या अश्रेष्ठ नहीं है। कोई मुँह या पैर से पैदा नहीं हुआ है, सभी माँ की कोख से ही पैदा हुए हैं। मनुष्यों में...
बलि की हिचकी - 2 प्रार्थना की कोई भाषा नहीं होती, शब्द नहीं होते। कुरान की आयतें,गीता के श्लोक, नानक के सबद,बाइबिल की वरसेज़- सभी केवल इशारे हैं। असली प्रार्थना होती है मौन में।
जाति व्यवस्था से लड़ते हो क्योंकि तुम सबसे नीचे हो यदि तुम जूतों में पड़े न होते फिर क्यूँ बार-बार यूँ रोते तुमने यह दंश सहा न होता किसी ने तुमसे कहा न होता तुम भी फिर आराम में होते आ-आ कर यूँ जमा न होते जाति व्यवस्था की सीढ़ी में जो दमित, कुचला जाता है वह ही केवल चिल्लाता है जिसने सीढ़ी पर पाँव टिकाया ज्यों ही थोड़ा ऊपर आया पहले वह थकान मिटाता है फिर वह केवल सुस्ताता है चाहते हो तुम जाति भेद मिटाना पर अपनी जाति को बचाना जब तक तुम जाती से सम्बंधित हो तब तक व्यवस्था के अन्तर्गत हो ऊंच नीच के पौधे को जल देते हो जाति व्यवस्था को बल देते हो जाति छोड़ने का जतन किया है बंधन तोड़ने का प्रयत्न किया है अपनी ओर से छोड़ भी डाला जाति ने तुमको जकड़ रखा है तुम जिस कोने में जाओगे जाति को अपने से पहले पाओगे जाति-व्यवस्था के...