सत्य ?


जल कणों से बन-
असीम हो गया आसमान।
जल कणों को बना माध्यम,
मुझे छूट है आसमान।
कभी मस्तक, कभी पलकों-
और कभी अधरों पर-
करता है वह अंकित चुम्बन।
छू सकता हूँ तुम्हें-
कर सकता हूँ अनुभव-
आंदोलित है ह्रदय-
आलिंगित कर तुम्हें-
हे आसमान।

मुस्काती है इतना देह-जान-
नहीं कर सकता हूँ बखान-
अंतर में अगणित कण बरसे-
स्वच्छ हो गया यह वसन।
हूँ इतना प्रसन्न सुखी-
जितना यह अम्बर अनंत महान।

आद्र कणो की निरंतर छुअन-
शीतल स्पर्शों का ह्रदय में गमन-
झूमता है मन, होता है नृत्यातुर तन-
तुमको मैं आनंदकारी मान,
बिंध जाता हूँ होकर निष्प्राण-
होता है केवल-
सांसों का आवागमन।

शीतल आर्द  ऋतु में तुम्हारा स्मरण-
लगाता है चार चाँद मेरे सुख में-
तुम हो सर्वव्याप्त, चहुँ ओर विद्यमान-
प्राप्त होता है मुझे सुख का दान-
चेहरे पर रहती है खिलती मुस्कान-
ऊँचे स्वर में गाता हूँ  गान।

निरंतर स्पर्शों में तुम्हारे करता हूँ स्नान-
हे वर्षा के कणों, तुम हो मेरे प्राण-
कितने कोमल हो संदेशवाहक-
तुम छूते हो आसमान-
तुम्हारी बूंदों का प्रत्येक क्षण-
देता है जीवन सत्य का ज्ञान।

हे असीम आसमान-
एक जीवन बून्द तुम्हारी-
गिरते ही धरा पर-
स्वयम हो जाती निष्प्राण-
किन्तु करती उद्घाटन।

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